Wednesday, 26 April 2017

बचपन दौहराती हूं


तुझमे अपना बचपन दौहराती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
तुझपे जब भी लाड़ लुटाती हूँ,
मेरे माँ-बाऊजी की गोध में खेल आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
जब भी तेरी अठखेलियों पे मुस्कुराती हूँ,
मम्मी-पप्पा को महसूस कर आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
जब गुस्सा करते-करते हँस जाती हूँ,
तब अपने मइके के आँगन में गुडलिया चल आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
तेरे हुंकारों में, बड़ों के प्यार को समझ जाती हूँ,
तेरे आने से, मेरा अस्तित्व जान पाती हूँ,
कितनी साधारण है ये ज़िन्दगी,
कितना प्यार है इस जीवन में,
तुझे देख-देख खुद को याद दिलाती हूँ,
तुझमे अपना बचपन दौहरती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।।।

चारुलता