Thursday, 24 September 2020

तू तो एक प्राणी मात्र है


किस छल-कपट से जी दुखाता है,

किस झूठ से आंखे नम है,

किस छलावे से भारी-भारी मन है,

तू तो सिर्फ एक प्राणी मात्र है।।

जो पेड़ छाया-सुख देता है,

जिसका फल स्वाद-आनंद दिलाता है,

जिसकी डाल पे सखी-संग झूला,

जीवन मरुथल चाशनी सा गोते लगाता है,

इंसान उसे बेझिझक काट देता है,

फिर तू तो एक प्राणी मात्र है।।

जो धरती बोझ उठाती है,

सीना चीर अन्न दान देती है,

जो सबको थामे रखती है,

माँ कहता है फिर भी,

इंसान बेझिझक थूक देता है,

फिर तू तो एक प्राणी मात्र है।।

जो शक्ति है,

सम्पूर्ण जगत की पालन-कर्ता है,

रूप अनेक पर अर्थ तो एक है,

इंसान बेझिझक जब उसे ही, 

नकारता है,

होनी को अनदेखा कर, पाप कर,

इंसान बेझिझक खुद को धोका देता है,

फिर तू तो एक प्राणी मात्र है,

तू तो एक प्राणी मात्र ही है।।।

रुक जा, संभल जा,

खुद को बदलने मत दे,

मुस्कुरा, सही राह चुनता जा,

ईश्वर तेरे संग है,

तू तो कहता है,

तू एक प्राणी मात्र है,

पर प्रभू के लिए तू प्रेम-पात्र,

संतान-मात्र है।।।


चारुलता

Saturday, 9 May 2020

Women's day

हमारे बुज़ुर्ग सच्ची बहुत ही समझदार थे,
इसलिए लड़कियों को घर पे और ,
लड़को को पाठशाला पढ़ने भेजा करते थे,
पढ़ाई लिखाई से, पाठ करने से दिमाग खुलता है,
आदमी किसी लायक बनता है,
आदमी किसी तो लायक बनेगा,
औरतें जन्म से ही जिम्मेदार होती है,
ज़्यादातर,
बिना पाठशाला में गणित पढ़े,
घर खर्च चलाती है,
Economics कठिन होगा कइयों के लिए,
लेकिन economics का मूल तो मेरी दादी ने,
मुझे बचपन में ही सिखा दिया,
कब क्या खरीदना है,
हिसाब से कैसे चलना है,
और Savings,
Savings के तारीखे औरतों से बेहतर,
कोई नही जनता,
अनजाने में ही सही Science की प्रोफेसर,
होती है, खाने में नामक कब डालना है,
किस सब्ज़ी में कौनसा मसाला,
किस अनुपात में डाला जाएगा,
अरबी में अजवाइन, कड़ी में पंचकूट,
खटाई में राई का छौंक,
सिर्फ स्वाद का खेल नहीं, सेहत के लिए,
क्या है लाभदायक, डॉक्टर से पहले,
औरत बताती है इलाज,
तो क्या हुआ sociology नहीं पढ़ा,
लेकिन पढ़े लिखों से ज़्यादा,
हमारी बड़ी बताती थी कचरा इधर उधर मत फेको,
घर में झाड़ू भी तो वही लगाती थी,
गिला सुख अलग रखो,
रसोई में हाथ धोये बिना ना घुसों,
घर मैं चप्पल  न पहनों,
शनिवार को तेल की मालिश करवालों,
ऊपर वाले का नाम जाप लो।
बाप रे list पूरी होती नहीं,
और आदमी है जो आज भी सीखता नहीं।
मेरी 2 साल की बेटी चीजें जगह पे,
रखती है, खाने के बाद बर्तन मांजने में,
रखती है।
लेकिन मेरी सहेली का पति आज भी,
T.v , पंखा, लाइट, गीज़र खुला छोड़ता है,
खुद की फ़ाइल ढूंढते समय रोज़ अपनी बीवी,
पे चिड़चिड़ाता है।
आइंस्टीन को स्कूल से निकले जाने पर,
उनकी माँ ने उन्हें पढ़ाया था,
नारायण मूर्ति infosys के मालिक है,
लेकिन उनका साथ, उनके घर का सिस्टम,
सब उनकी बीवी ने संभाल था।
विडंबना असल में ये है,
औरत का समर्पण ही उसे मोक्ष,
से दूर करता है,
सबको संभालते-संभालते, वो डोरियाँ,
उसके उंगलियों में ऐसे घुस जाती है,
कभी बच्चों से ममता में, कभी पति के मोह में,
कभी फ़र्ज़ तो कभी संस्कार, कुछ न कुछ,
आड़े आता है,
खेलने, सजने के शौक को छोड़,
Cooking को अपना carrer बना लेती है,
सफाई, नर्सिंग, धोबी, interior में,
एक्सपर्ट बन जाती है।
घर में ताकत माँ ही लाती है,
जो पहले औरत और उससे पहले लड़की
होती है।
इतना संभालने पर भी,
ये दुनियाँ पति को देवता इसलिए
कहती है, क्योंकि महारानी होने पर,
सीता ने नहीं,
अहम कभी मंदोदरी में नहीं,
एक बेटी , पत्नी, बहु माँ बनने
के बाद, मायके में नहीं,
कोई परीक्षा, अपेक्षा, स्वार्थ वो रखती नहीं,
अपनाने की शक्ति धरती माँ में है,
समुद्र तो कचड़ा निकल फेकता है,
सृजिन की शक्ति, बहने की शक्ति,
सींचने की शक्ति,
औरत देवी नहीं, माँ बनकर ही खुश है,
वो आज भी प्रकृति से जुड़ी है,
हेम पुत्री होकर भी कैलाश में,
वैरागी संग घर बसाती है,
महालक्ष्मी होकर भी विष्णु के पैर दबाती है,
स्व ब्रम्हाड़ी होकर, रचयिता ब्रह्मा को कहलाती है,
आदमी के अहम को,
उसके नाजायज़ अहम को,
औरत ही शांत कराती है,
औरत ही शांत कराती हैं।.....

चारुलता



लॉकडौन

मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा,
बड़े दिन हुए कुछ लिखा नहीं,
तुमने कुछ नया भेजा नहीं,
लॉकडौन है कुछ तो फायदा उठाओं,
अपनी creativity दिखाओं।
मैंने कहाँ हांजी लॉकडौन है, तभी तो,
Creativity हड़ताल पे है,
मित्र बोलै ऐसे-कैसे,
मैंने कहाँ भाईसाहब ऐसे..
आप बेटे है,पति है एक बार औरत बनकर देखें,
तो जान पाएंगे,की आम दिनों,
का जो timebreak,हम औरतें,
कुछ लिखने,पढ़ने,बनाने,सिलने,
कुछ कसरत,या लंबी सांस लेने में,
इस्तेमाल करती थी,अब वो भी,
मुए कोरोना के कारण छिन गया है,
तुम लंबे लॉकडौन के चलते डर रहे हो,
घरबार औरतें भी रही है सब्ज़ी के बढ़ते दाम देखकर,
तुम घर में बैठे-बैठे bore हो गए हो,
थक औरतें भी गई है बच्चों को घर में खुश,
रखने की तरकीबें सोच कर,
तुम्हे नींद नहीं आती,office जो गए नहीं,
दोस्तों से मिलें नहीं,जाम जो टकराएं नहीं,
हमें नींद आती नहीं,कल किसकी मर्ज़ी का बनाना है,
Homework के साथ Classwork भी तो समझना है,
गर्मी में परिवार को हँसाना है,
और दुखती कमर पर कल ज़रूर बाम लगाना है।
कुछ अच्छे पति साथ देते है,
लेकिन इस मुए कोरोना के कारण,
जो औरतों पे संकट आया है,
श्राप ज़रूर लगेगा,जल्दी भस्म होगा,
औरत की आह में शक्ति बहुत होती है,
एक माँ के क्रोध में अग्नि बहुत होती है।

चारुलता

सफ़ेद बाल

बड़ी जल्दी तुम्हारे नन्हें पैर, मेरी गोद से बाहर भागने लगे,
बड़ी जल्दी मेरा आँचल छोड़, खिलोने, पेंसिल उठाने लगे,
तुम्हारे पीछे भागते-भागते मेरी सांसें फूलने लगी,
जो गोद में उठाया तो मेरी कमर बोलने लगी,
तुम्हे तैयार करते -करते जो आईने से नज़र मिली,
तब जाके सफेद बालों से मेरी मुलाकात हुई,
हकीकत से सामना हुआ तो जाना,
"तुम तो बहुत young दिखती हो"
"बड़ी slim हो, क्या करती हो"
ये सुनते और तुम्हे देखते सब भूल गई थी,
तुम बच्चों की चमत्कारी दुनियाँ में खो गई थी,
तभी तो इतने सालों, महीनों, घंटों को जल्दी कह रही थी,
भई खो-खो हो या कबड्डी, volley-ball हो या फिर
High-jump, सिलाई, बुनाई, painting या drawing,
Cooking, anchoring, interviews, non-stop working,
कभी मैं पीछे हटी नहीं, आज में कैसे बैठ गई,
अपनी उम्र से मैं दोस्ती करने लगी।।।
अब समझी क्यों ज़रा से खटके से बड़ों की डांट,
खाते थे, बेवजह शोर से बड़े क्यों डर जाते थे,
उम्र का लिहाज़ था भैया, उम्र का लिहाज़ है,
औरत हूँ इसलिए औरत के भाव प्रकट करती हूँ,
पिता की बेटी हो या भाई की बहन,
पति की पत्नी हो या बच्चों की माँ,
फिक्र से बेफिक्र कभी हो नहीं पाती,
औरतों की खुद से मुलाकातें तंग,
और खुद की फिक्र हो नहीं पाती।।।

चारुलता

Sunday, 26 January 2020

मॉं ने औरत को स्वार्थी बना दिया

ना सर्दी ने कभी उसे सिकुड़ा था,
ना ही गर्मी में हताश हुई,
पानी बरसा कितना भी,
चाहे वो बीमार हुई,
मुस्कुराती रहती थी,
सुबह की जल्दी - रात की देरी,
कभी उसे नहीं सताती थी,
पर ये क्या,,, आज उसे मैंने,
हाथ नम करते देखा है,
काम करते हुए पहली बार चिड चिड़ाते देखा है,
खाना बनाने की जल्दी में देखा है।
औरत, मां बनते ही बदल गई,
लगता है कमज़ोर हुई।
हां। अब समझी, ममता ने उसे झुका दिया,
या ऐसा कहूं बहुत कुछ सीखा दिया,
मेरी नन्ही सी जान को सर्दी ना पकड़े,
तो उसे पकड़ने वाले हाथों को मां ने नम किया,
मेरे बच्चे की एक आह! ने मां को काम के प्रति ,
चीड़ चिडा बना दिया,
मेरी जान की आंख से आंसू गिरने से पहली ,
मां ने खाना हड़ बड़ी में बना दिया।
ममता ने औरत को मां बना दिया,
औरत जो सबके लिए करती थी,
मां को थोड़ा स्वार्थी बना दिया,
ममता ने उसे खुद के लिए,
समय निकालना सीखा दिया,
उस खुद के लिए जिसमें वो खुद को जीती है,
ममता ने मां को स्वार्थी बना दिए,
मां को आईना निहारना छुडा दिया।।

चारूलता

Wednesday, 24 April 2019

मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ

सब कहते हैं मैं बड़ी हुई हूँ,
पर मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ,
सब कहते है अब संभल गई हूँ,
लेकिन अभी-अभी तो खेलना,
सीख गई हूँ,
इंसान की सोच और प्रकृति,
के नियमों में फर्क ही बहुत है,
प्रकृति ने जब मुझे सबसे खूबसूरत,
प्यारे खिलोने दिए,
तब इंसानो के रीती-रिवाजों ने,
मुझे बहुत उलझा दिया,
जब ये खिलोने, निखरने लगे,
तब इंसानो के नियमों ने मुझे,
हँसना भुला दिया, बहुत थका दिया,
छोटी हूँ पर ज़िम्मेदार हूँ,
खुश रहना जानती हूँ,
खुश रहने का हक़ है,
तभी तो प्रभु ने इतने सूंदर,
तोहफों से नवाज़ा है,
सब कहते है मैं बड़ी हो गई हूँ,
लेकिन मैं एक छोटी सी,
खुशनसीब,
कुशाग्र और काईशा की,
माँ बन गई हूँ।।।

चारुलता

वसूली वाला ऊपर वाला

तू बना था प्यार समझने के लिए,
तू बना था भरोसा करने के लिए,
तू बना था भक्ति-भाव जगाने के लिए,
रूप दिया तुझे एकाग्रता बढ़ाने के लिए,
पर तेरे प्रेम को इस्तेमाल करते है,
बहकाने के लिए,
भरोसा, डर की घुटन में फसा है,
भक्ति-भाव को तोड़-मरोड़ कर,
अंध-विश्वास के क़दमों में दबोच रक्खा है,
और तेरे रूप का क्या कहना,
जो सूंदर है, सरल है, साधारण है,
ऐसा रूप कहाँ छिपा बैठा है,
एकाग्रता खंडित करने को,
सूंदर गहने, और वस्त्रों का लाग-लपेट,
कर रूप जो बनाया है,
तू अंतर्मन है,
ऊपरी प्रपंच बना रक्खा है,
तू शांति है,
दिखावे का ढोल बना रखा है,
ये संसार तू है, और तुझमे ये,
संसार है,
फिर भी तुझे संसार से परे बना रखा है,
क्या सोचता होगा तू भी बैठा-बैठा,
तुझे तो इंसान ने वसूली करने वाला,
बना रखा है।

चारुलता