सब कहते हैं मैं बड़ी हुई हूँ,
पर मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ,
सब कहते है अब संभल गई हूँ,
लेकिन अभी-अभी तो खेलना,
सीख गई हूँ,
इंसान की सोच और प्रकृति,
के नियमों में फर्क ही बहुत है,
प्रकृति ने जब मुझे सबसे खूबसूरत,
प्यारे खिलोने दिए,
तब इंसानो के रीती-रिवाजों ने,
मुझे बहुत उलझा दिया,
जब ये खिलोने, निखरने लगे,
तब इंसानो के नियमों ने मुझे,
हँसना भुला दिया, बहुत थका दिया,
छोटी हूँ पर ज़िम्मेदार हूँ,
खुश रहना जानती हूँ,
खुश रहने का हक़ है,
तभी तो प्रभु ने इतने सूंदर,
तोहफों से नवाज़ा है,
सब कहते है मैं बड़ी हो गई हूँ,
लेकिन मैं एक छोटी सी,
खुशनसीब,
कुशाग्र और काईशा की,
माँ बन गई हूँ।।।
चारुलता
पर मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ,
सब कहते है अब संभल गई हूँ,
लेकिन अभी-अभी तो खेलना,
सीख गई हूँ,
इंसान की सोच और प्रकृति,
के नियमों में फर्क ही बहुत है,
प्रकृति ने जब मुझे सबसे खूबसूरत,
प्यारे खिलोने दिए,
तब इंसानो के रीती-रिवाजों ने,
मुझे बहुत उलझा दिया,
जब ये खिलोने, निखरने लगे,
तब इंसानो के नियमों ने मुझे,
हँसना भुला दिया, बहुत थका दिया,
छोटी हूँ पर ज़िम्मेदार हूँ,
खुश रहना जानती हूँ,
खुश रहने का हक़ है,
तभी तो प्रभु ने इतने सूंदर,
तोहफों से नवाज़ा है,
सब कहते है मैं बड़ी हो गई हूँ,
लेकिन मैं एक छोटी सी,
खुशनसीब,
कुशाग्र और काईशा की,
माँ बन गई हूँ।।।
चारुलता
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