Monday, 1 April 2019

आप जैसी

जैसे-जैसे बड़ी हो रही हूँ,
वैसे-वैसे जानती जा रही हूँ,
मैं तो आपके जैसी ही ,
बनती जा रही हूँ।
आज आईने के सामने खड़ी हुई,
तो नज़रों में आप है,
बाऊजी, मेरा नज़रिया, आप,
मैं आप जैसा सोचने लगी,
मैं आप बनती जा रही हूँ।
माँ थोड़ा आराम करो, अब थोड़ी
ढील तो दो, आज मैं यूँ ही सख्त,
खड़ी रही, जाने कैसे ढल गई,
माँ मैं तो आप बनती जा रही हूँ।
पप्पा ,कुछ अलग करिये,
नया करते है,
कहती बहुत हूँ, पप्पा,
मैं आपसे महकने लगी हूँ,
मैं आप जैसी बनती जा रही हूँ।
ग़लत करती हो मम्मी, करते-करते,
मैं भी ग़लत कर जाती हूँ,
मम्मी जैसी हूँ मैं भी, ये भी सोच
मैं पति हूँ।
मीना बुआ बहुत सोचती है,
थोड़ा संभालो, कहते-कहते,
कब सोच में डूब गई,
और ऐसे ही बह गई,
बुआ मैं आप जैसी बनती जा रही हूँ।
बेबा बुआ हस्ती है, हर
गम को चबा जाती है,
जाने मैं कब बुआ से सीख गई,
जाने मैं कब रोना भूल गई,
लल्ला बुआ मैं आप जैसी बनती
जा रही हूँ।
मैं जानती हूँ इन सबको,
पहचानती हूँ इन सबको,
क्योंकि खुद से रोज़ मुलाकात करती हूँ,
ग़लतियाँ भी जानी-भुजी लगती है,
फिर भी दोहरा मैं जाती हूँ,
मैं अपने आपमे इन सबको जीता पाती हूँ,
बदमशयों मैं भैया,
शैतानियों मैं तन्नू नज़र आती हूँ ,
और ये सब मैं, अमी,
आपके सामने सुलझा पाती हूँ,
अमी मैं तो आपके जैसी बनती जा रही हूँ।

चारुलता

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