Tuesday, 14 February 2017

आज के चुटुकुले

 हांजी हस्ती हूँ मैं भी,
हँसी तो आ ही जाती है,
जो चुटुकुलों का स्तर गिरा है,
शायद उसी पे आती है,
कितना आसान है,
एक माँ की ममता की हँसी उड़ान,
एक बीवी के विश्वास की खिल्ली उड़ान,
एक बहु के समर्पण का मज़ाक उड़ान,
चुटुकुलों की आग से कुछ तो जल रहा है,
संस्कार धुआं बनकर उड़ रहा है,
बनते थे चुटुकुले हँसाने के लिए,
नहीं बनते थे किसी को चुभाने के लिए,
मज़ाक में हाथी की शादी चींटी से होती थी,
लेकिन अब औरत की तुलना चुड़ैल से होती है,
जो सावित्री यम से अपने सुहाग ले आती है,
आज उसका रूप बदल,
करवाचौथ पे अपने,
 पति से पैर धुलवाती है,
 आदमी के सुख की कामना,
 तो आज भी वही औरत करती है,
"गर दुनियां में आज सावित्री नहीं होती है,
तो कौनसा सत्यवान भी जनम लेता है,
 ऊपर वाला जोड़ी बनाकर भेजता है,
 चुड़ैल के साथ तो प्रेत ही होता है",
अगर डरती है थोड़ा,
तो क्या ग़लत करती है,
दुनियां की मायने बदल रही है,
लेकिन स्त्री के अस्तित्व का मज़ाक बनाना,
 चुटकुला है समझकर हँसी तो आती है,
 लेकिन इसमें कोई अच्छाई नज़र नहीं आती है,
 फिर भी स्त्री की शक्ति का अंदाज़ा हो जाता है,
जब औरतें महफिलों में,
इन चुटुकुलों पर हँस देती है,
और जो खुद व्यंग है,
उन्हें भी बक्श देती है।।।।
चारुलता

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