यहाँ पिंजरे को लोग घर कहा करते है,
दरवाज़े तो दूर, जाली वाली खिड़कियां,
भी तंग खुला करती है,
रसोई की महक तो नहीं,
आस-पास के हाल-चाल को भी,
तांक-झांक समझ लेते हैं,
यहाँ पिंजरे को लोग घर कहते है।
घर के नाम से चेहरे कस लेते है,
छुट्टी के दिन भी बाहर मस्त रहते है,
मेहमान ना आए डर-डर के रहते है,
माँ-बापू को गाँव में अकेला रहने देते है,
यहाँ पिजरे को लोग घर का नाम देते है।
बच्चों को खेलने जाने नहीं देते है,
मेल-जोल से दूर मॉल में खिला लेते है,
बांटके नहीं भीड़ में अकेले,
Ice-cream चखा देते है।
यहाँ पिंजरे मे लोग,
बड़े शेहेर में रहते है,
ऐसा कहते है।।।।।
चारुलता
दरवाज़े तो दूर, जाली वाली खिड़कियां,
भी तंग खुला करती है,
रसोई की महक तो नहीं,
आस-पास के हाल-चाल को भी,
तांक-झांक समझ लेते हैं,
यहाँ पिंजरे को लोग घर कहते है।
घर के नाम से चेहरे कस लेते है,
छुट्टी के दिन भी बाहर मस्त रहते है,
मेहमान ना आए डर-डर के रहते है,
माँ-बापू को गाँव में अकेला रहने देते है,
यहाँ पिजरे को लोग घर का नाम देते है।
बच्चों को खेलने जाने नहीं देते है,
मेल-जोल से दूर मॉल में खिला लेते है,
बांटके नहीं भीड़ में अकेले,
Ice-cream चखा देते है।
यहाँ पिंजरे मे लोग,
बड़े शेहेर में रहते है,
ऐसा कहते है।।।।।
चारुलता
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