Wednesday, 24 April 2019

मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ

सब कहते हैं मैं बड़ी हुई हूँ,
पर मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ,
सब कहते है अब संभल गई हूँ,
लेकिन अभी-अभी तो खेलना,
सीख गई हूँ,
इंसान की सोच और प्रकृति,
के नियमों में फर्क ही बहुत है,
प्रकृति ने जब मुझे सबसे खूबसूरत,
प्यारे खिलोने दिए,
तब इंसानो के रीती-रिवाजों ने,
मुझे बहुत उलझा दिया,
जब ये खिलोने, निखरने लगे,
तब इंसानो के नियमों ने मुझे,
हँसना भुला दिया, बहुत थका दिया,
छोटी हूँ पर ज़िम्मेदार हूँ,
खुश रहना जानती हूँ,
खुश रहने का हक़ है,
तभी तो प्रभु ने इतने सूंदर,
तोहफों से नवाज़ा है,
सब कहते है मैं बड़ी हो गई हूँ,
लेकिन मैं एक छोटी सी,
खुशनसीब,
कुशाग्र और काईशा की,
माँ बन गई हूँ।।।

चारुलता

वसूली वाला ऊपर वाला

तू बना था प्यार समझने के लिए,
तू बना था भरोसा करने के लिए,
तू बना था भक्ति-भाव जगाने के लिए,
रूप दिया तुझे एकाग्रता बढ़ाने के लिए,
पर तेरे प्रेम को इस्तेमाल करते है,
बहकाने के लिए,
भरोसा, डर की घुटन में फसा है,
भक्ति-भाव को तोड़-मरोड़ कर,
अंध-विश्वास के क़दमों में दबोच रक्खा है,
और तेरे रूप का क्या कहना,
जो सूंदर है, सरल है, साधारण है,
ऐसा रूप कहाँ छिपा बैठा है,
एकाग्रता खंडित करने को,
सूंदर गहने, और वस्त्रों का लाग-लपेट,
कर रूप जो बनाया है,
तू अंतर्मन है,
ऊपरी प्रपंच बना रक्खा है,
तू शांति है,
दिखावे का ढोल बना रखा है,
ये संसार तू है, और तुझमे ये,
संसार है,
फिर भी तुझे संसार से परे बना रखा है,
क्या सोचता होगा तू भी बैठा-बैठा,
तुझे तो इंसान ने वसूली करने वाला,
बना रखा है।

चारुलता

Monday, 1 April 2019

आप जैसी

जैसे-जैसे बड़ी हो रही हूँ,
वैसे-वैसे जानती जा रही हूँ,
मैं तो आपके जैसी ही ,
बनती जा रही हूँ।
आज आईने के सामने खड़ी हुई,
तो नज़रों में आप है,
बाऊजी, मेरा नज़रिया, आप,
मैं आप जैसा सोचने लगी,
मैं आप बनती जा रही हूँ।
माँ थोड़ा आराम करो, अब थोड़ी
ढील तो दो, आज मैं यूँ ही सख्त,
खड़ी रही, जाने कैसे ढल गई,
माँ मैं तो आप बनती जा रही हूँ।
पप्पा ,कुछ अलग करिये,
नया करते है,
कहती बहुत हूँ, पप्पा,
मैं आपसे महकने लगी हूँ,
मैं आप जैसी बनती जा रही हूँ।
ग़लत करती हो मम्मी, करते-करते,
मैं भी ग़लत कर जाती हूँ,
मम्मी जैसी हूँ मैं भी, ये भी सोच
मैं पति हूँ।
मीना बुआ बहुत सोचती है,
थोड़ा संभालो, कहते-कहते,
कब सोच में डूब गई,
और ऐसे ही बह गई,
बुआ मैं आप जैसी बनती जा रही हूँ।
बेबा बुआ हस्ती है, हर
गम को चबा जाती है,
जाने मैं कब बुआ से सीख गई,
जाने मैं कब रोना भूल गई,
लल्ला बुआ मैं आप जैसी बनती
जा रही हूँ।
मैं जानती हूँ इन सबको,
पहचानती हूँ इन सबको,
क्योंकि खुद से रोज़ मुलाकात करती हूँ,
ग़लतियाँ भी जानी-भुजी लगती है,
फिर भी दोहरा मैं जाती हूँ,
मैं अपने आपमे इन सबको जीता पाती हूँ,
बदमशयों मैं भैया,
शैतानियों मैं तन्नू नज़र आती हूँ ,
और ये सब मैं, अमी,
आपके सामने सुलझा पाती हूँ,
अमी मैं तो आपके जैसी बनती जा रही हूँ।

चारुलता