Thursday, 11 August 2016

भगवान भी ग़ज़ब करते है.....

भगवान भी ग़ज़ब करते है,
औरतों को दिल क्यों दिया करतेवरहै,
भर जाते है ज़ख़्म, कितने भी गहरे सही,
दिल की चोटें लिए फिरते है,
औरतों को दिल क्यों दिया करते है।।।
सोच के लिए आसमा नहीं,
ज़ुबान के लिए स्वाद नहीं,
नज़रों के लिए नाज़रियां नहीं,
महसूस करना पर जीना नहीं,
भगवान भी ग़ज़ब करते है,
औरतों को दिल क्यों दिया करते है।।।
जीवन यहाँ, पर बढ़ो किसी के लिए,
चाहत जानो, किसी और के लिए,
खुद को पहचानों, उनके लिए,
चलते जाओ, साथ देने के लिए,
रोना नहीं, हंसना सीखो,
उनके लिए सब कुछ सीखो,
भगवान भी ग़ज़ब करते है,
औरत को दिल क्यों दिया करते है,
दिल को निकाल कर देते एक machine fit,
Feed करते उसमे उनकी सारी need,
रहता खुश ये संसार सारा,
चलता वो रोबोट तो, कम से कम जीवन सारा।।।
भगवान भी ग़ज़ब करते है,
ज़रूरत है robot की,
फिर भी औरत को उसके दिल के साथ,
धरती पे भेज दिया करते है।।।

चारुलता

Wednesday, 29 June 2016

ये वो जगह हैं

 ये वो जगह है अब जहाँ,
पानी को रोज़ बहाते है और,
Mineral water महेंगा खरीदते के लाते है।
ताज़े फल ना सही,
Mixed fruit jam ही चख लेते है।
पेड़ काटते है सड़क के लिए तो,
Air purifier घर लाते है।
पंछियों के घोसले उजाड़ते है पर,
Door bell ची ची वाली लगते है।
मम्मी-पप्पा घर मे अकेले सही और,
Facebook पे mothers- fathers day,
के video देख like thokte है।
ये वो जगह है अब जहाँ,
चेहरे पे कितनी धुल चडी हुई पर,
आईने तो colin से चमचमाता है।।

चारुलता

Tuesday, 28 June 2016

इतना तो रहम कर

किसी से इतनी नसफरत ना कर ऐ दोस्त,
की वो तेरा ज़हन दबोच ले,
किसी को इतना प्यार भी ना कर,
की वो तेरी ख्वाइशें चुरा लें।
करना है तो इतना कर खुद पे रहम,
खुदही से प्यार कर,
और ग़लती ना दोहराने पर,
खुदही को माफ़ कर,
जब विश्वास करके खुदही,
को समझा लेगा, अच्छा व्यवहार करेगा,
तो समन्दर कितना ही नमकीन सही,
रोगों को तो दूर करेगा।

चारुलता

Tuesday, 21 June 2016

तू ही तू

कुछ ऐसा देखा की अरसों,
से उम्मीद ही छोड़ दी,
जाने क्यों तुमसे मिलके लगा,
की हवा में नमी अभी बाकी है,
नहीं तो पानी भी सूखा,
जान पढता था।
जो अब कभी बेवक़्त कही हूँ,
तो हर झोका तुम्हारी आहात लगती,
जो श्रृंगार करूँ तो,
आईना तुम्हारी झलक देता है,
जो कभी अकेले में इतराउं,
तो हर झरोखा तुम्हारी नज़र,
सा पहचान पढता है।
इतना प्यार, ऐसा एहसास,
तुमने ही तो जगाया है,
अब अगर मैं भीग रही हूँ,
तो मेरी क्या खता है,
अब अगर मैं डूब रही हूँ,
तो मुझे क्या परवाह है।
तुझे नहीं बहने दूंगी ये,
ही मेरा वादा है।
आ फिर मुझे संभाल ले,
आ फिर मेरे साथ जी ले।।
चारुलता

Monday, 20 June 2016

Happy birthday MUMMY

मैं कुछ अलग ही महसूस करती हूँ,
ख़ुशी भी बहुत होती है,
जो जननी है उसे जन्मदिन की बधाइयाँ देती हूँ,
खुश रहे वो ,
खिलखिलाती रहे वो,
जिस माटी में सोंधी खुशबूहोती है,
फूल उसी के हमेशा महकते है,
सागर में पानी भरा ही सही,
सींचती तो नदी ही है।।।
इस नदी को,
इस माटी को,
प्रणाम।

जन्मदिन की बधाइयाँ मम्मी।
Love you , टेक केअर

Thursday, 16 June 2016

माँ

अरसा हुआ ये शब्द पुकारा नहीं,
जिसमे सृष्टि समाई है,
बोला सबने ये दुनियाँ,
उसी की सजाई है।
है ये शब्द बड़ा ही मीठा,
इसमें बड़ी गहराई है,
कहने की ये बात नहीं ,
सारी रचनाए इसी से आई है।
पर क्या करूँ,
हुआ अरसा इसे पुकारे,
वो प्यारी लहर ने कभी,
भिगोया नहीं,
उस ठहराव ने कभी थामा नहीं।
शायद इसलिए समय बिता यूँ,
तरसती रही मैं जीवन को यूँ।
जो इसमें अमृत रमाया है,
चखा मैंने इसे कभी नहीं।
जिसे अरसो से पुकारा नहीं,
डरती हूँ उसके लिए भी मैं,
माँ हैं मेरी, जननी हैं वो,
पर क्या करूँ दूर खड़ी है वो,
फूल वहाँ महकते नहीं,
कली वहाँ खिलती नहीं,
अँधेरे में वो रहती है,
भाव को चूर-चूर कर देती है,
रौशनी को आने देती नहीं,
घुटन को जाने देती नहीं।
एक ड़ोर थामे बैठी हूँ,
सब्र को दबोचे बैठी हूँ,
उम्मीद अभी भी छोड़ी नहीं,
शायद पुकारूँ में फिर कभी।......
चारुलता

Tuesday, 7 June 2016

अच्छा हुआ जो आज तूने मुझे रुला दिया

चल अच्छा हुआ आज
तूने मुझे रुला दिया,
अरसो बाद सही आँखें मेरी नाम तो हुई।
होठों को खिलाते-खिलाते,
पलखो को भींचना भूल गई
चल अच्छा हुआ आज तने मुझे रुला दिया
जीवन में गम को नज़रअंदाज़ करते-करते,
हक़ीक़त को अपनाना भूल गई,
सूख गया था जो दरिया,
उस माटी में नमी पंहुचा गया,
अच्छा हुआ जो तूने मुझे रुला दिया।
हँस-हँस के थक गई,
यूँ फूल चुगते-चुगते थक गई,
अच्छा हुआ जो काँटा चुब,
असलियत से तो सामना हुआ,
रोना भी ज़रूरी है,
आँख धोना भी ज़रूरी है,
अच्छा हुआ जो रुला दिया,
बहुत अच्छा हुआ जो आज ही रुला दिया,
समेटे हुए आंसुओं को बिखरा दिया।।।
चारुलता

Aur koi nahi

Kissi ko bura naa lage sochti hun,
Khud ki chahat ko chakna choor kr jati hun,
Sochti hun samjhenge log isharon se,
Jaane kyun khud ko zakham pahuchati hun..
Nahi aaya koi, naa hi aata hai,
Inn bikhari lehron ko sametne,
Jaane kyu phir bhi har baar,
Raat nahi chandani pe karti hun aitbaar,
Zehen mai hai sab phir bhi,
ladh baithti hun har baar,
Jaane kb tk rahungi khud se khafa,
Kab samjha paungi,
Mein hi mujhko apnaungi,
Koi aur nahi......

CharuLata....

पप्पा ये कैसी दुनियाँ है...

नहीं समझते है समझदार इशारों की भाषा,
पप्पा ये कैसी दुनियां है,
मेरे जीवन में आपने भरा प्यार,
जो है वही तो दे पाती हूँ,
पर क्या करूँ दुनियाँ इससे
कुछ और ही समझ जाती है,
पप्पा ये कैसी दुनियां है।।
सहज होना अच्छा है,
लेकिन यहाँ शोर इतना है की,
मंदी आवाज़ लोगों के कानो
तक पहुँचती नहीं,
अपनों की तकलीफों में आनंद लेते है,
बुराइयाँ करके महकते है,
ना समझने पर सर उठाके चलते है,
पप्पा ये कैसी दुनियाँ है।।।
लगता था जो पहले अच्छा,
मानती थी मैं जिसे सही,
इस दुनियाँ में रहकर,
इन लोगों के बीच,
खुदको पागल समझ बैठी हूँ,
अब खुद का साथ दे पाती नहीं,
पप्पा ये कैसी मैं हूँ।।।।

चारुलता

Wednesday, 1 June 2016

Technology का इस्तेमाल और प्यार क जीवन

कवियों की महफ़िल में
बैठने को मन तो बहुत करता है,
पर क्या करों अभी मेरा एक,
छोटा सा नन्हा सा बच्चा है,
जो हर क्षण माँ मुम्मी माँ करता रहता है,
अभिमान बहुत करती हूँ उसके प्यार पर,
पर दुनिया का क्या,
disturbe होती है हर बात पर,
उसकी किलकारी मेरे जीवन मरुथल
को महकाती है,
लेकिन ये दुनियादारी बहुत अखर जाती है,
खुद के बच्चों से बात करने की
टाइम लिमिट बांधते है,
जो समय ना मिले तो,
गेम्स, मोबाइल उनके जीवन में दे मारते है।
हाँ मैं कुछ अलग करना चाहती हूँ,
मैं आज जैसा नहीं, गुज़रे कल
जैसा जीना चाहती हूँ।
नहीं- नहीं दुनियाँ से दूर नहीं,
लेकिन रिश्तों के करीब,
बड़ों की छाँव में गुज़रना चाहती हूँ,
नयी technology का इस्तेमाल करना,
और प्यार को जीवन बनाना चाहती हूँ,
मेरे बच्चे के जीवन में सच्चे रंग भरना चाहती हूँ।।।

चारुलताजीवन

बचपन बड़ा ही सच्चा था

जीवन बड़ा ही अच्छा था,
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था।
रेत में घर बनाते थे,
गिट्टी में उछल-कूद मचाते थे,
मकान की कोई चाह नहीं,
वो घर, घर नहीं जहाँ बड़ों की छाँव नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
क्या नया, क्या पुराना,
जो भी मिला, पहेनकर
खेलने जाना,
दिखावे की कोई ललक नहीं
वो उचाइयां ही क्या
जहाँ अपनों की साथ नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
कागज़ को विद्या कहते थे,
कलम की कदर हम करते थे,
नोट को मोस के जेब में धरते थे,
धन-दौलत का कोई लालच नहीं,
वो जायदात ही क्या जिसमे
बड़ों की मुस्कान नहीं।
वो बचपन बड़ा ही अच्छा था,
मीठे-मीठे प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाना,
मंदिर में प्रभु के साथ खेलके आना,
कोई शक नहीं, कोई शिकायत नहीं,
वो मांगना ही क्या,
जिसमे तुम्हारा कोई हक़ नहीं।
सच वो जीवन बड़ा ही अच्छा था,
हकीक़त में बचपन बड़ा ही सच्चा था।।

चारुलता