जीवन बड़ा ही अच्छा था,
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था।
रेत में घर बनाते थे,
गिट्टी में उछल-कूद मचाते थे,
मकान की कोई चाह नहीं,
वो घर, घर नहीं जहाँ बड़ों की छाँव नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
क्या नया, क्या पुराना,
जो भी मिला, पहेनकर
खेलने जाना,
दिखावे की कोई ललक नहीं
वो उचाइयां ही क्या
जहाँ अपनों की साथ नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
कागज़ को विद्या कहते थे,
कलम की कदर हम करते थे,
नोट को मोस के जेब में धरते थे,
धन-दौलत का कोई लालच नहीं,
वो जायदात ही क्या जिसमे
बड़ों की मुस्कान नहीं।
वो बचपन बड़ा ही अच्छा था,
मीठे-मीठे प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाना,
मंदिर में प्रभु के साथ खेलके आना,
कोई शक नहीं, कोई शिकायत नहीं,
वो मांगना ही क्या,
जिसमे तुम्हारा कोई हक़ नहीं।
सच वो जीवन बड़ा ही अच्छा था,
हकीक़त में बचपन बड़ा ही सच्चा था।।
चारुलता
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था।
रेत में घर बनाते थे,
गिट्टी में उछल-कूद मचाते थे,
मकान की कोई चाह नहीं,
वो घर, घर नहीं जहाँ बड़ों की छाँव नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
क्या नया, क्या पुराना,
जो भी मिला, पहेनकर
खेलने जाना,
दिखावे की कोई ललक नहीं
वो उचाइयां ही क्या
जहाँ अपनों की साथ नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
कागज़ को विद्या कहते थे,
कलम की कदर हम करते थे,
नोट को मोस के जेब में धरते थे,
धन-दौलत का कोई लालच नहीं,
वो जायदात ही क्या जिसमे
बड़ों की मुस्कान नहीं।
वो बचपन बड़ा ही अच्छा था,
मीठे-मीठे प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाना,
मंदिर में प्रभु के साथ खेलके आना,
कोई शक नहीं, कोई शिकायत नहीं,
वो मांगना ही क्या,
जिसमे तुम्हारा कोई हक़ नहीं।
सच वो जीवन बड़ा ही अच्छा था,
हकीक़त में बचपन बड़ा ही सच्चा था।।
चारुलता
No comments:
Post a Comment