Tuesday, 7 June 2016

अच्छा हुआ जो आज तूने मुझे रुला दिया

चल अच्छा हुआ आज
तूने मुझे रुला दिया,
अरसो बाद सही आँखें मेरी नाम तो हुई।
होठों को खिलाते-खिलाते,
पलखो को भींचना भूल गई
चल अच्छा हुआ आज तने मुझे रुला दिया
जीवन में गम को नज़रअंदाज़ करते-करते,
हक़ीक़त को अपनाना भूल गई,
सूख गया था जो दरिया,
उस माटी में नमी पंहुचा गया,
अच्छा हुआ जो तूने मुझे रुला दिया।
हँस-हँस के थक गई,
यूँ फूल चुगते-चुगते थक गई,
अच्छा हुआ जो काँटा चुब,
असलियत से तो सामना हुआ,
रोना भी ज़रूरी है,
आँख धोना भी ज़रूरी है,
अच्छा हुआ जो रुला दिया,
बहुत अच्छा हुआ जो आज ही रुला दिया,
समेटे हुए आंसुओं को बिखरा दिया।।।
चारुलता

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