Tuesday, 7 June 2016

पप्पा ये कैसी दुनियाँ है...

नहीं समझते है समझदार इशारों की भाषा,
पप्पा ये कैसी दुनियां है,
मेरे जीवन में आपने भरा प्यार,
जो है वही तो दे पाती हूँ,
पर क्या करूँ दुनियाँ इससे
कुछ और ही समझ जाती है,
पप्पा ये कैसी दुनियां है।।
सहज होना अच्छा है,
लेकिन यहाँ शोर इतना है की,
मंदी आवाज़ लोगों के कानो
तक पहुँचती नहीं,
अपनों की तकलीफों में आनंद लेते है,
बुराइयाँ करके महकते है,
ना समझने पर सर उठाके चलते है,
पप्पा ये कैसी दुनियाँ है।।।
लगता था जो पहले अच्छा,
मानती थी मैं जिसे सही,
इस दुनियाँ में रहकर,
इन लोगों के बीच,
खुदको पागल समझ बैठी हूँ,
अब खुद का साथ दे पाती नहीं,
पप्पा ये कैसी मैं हूँ।।।।

चारुलता

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