Monday, 26 November 2018

शायरी

अर्ज़ किया है

जो नज़र फेरी तो ,
बड़े ही ज़ालिम नज़र आए,
इत्तेफ़ाक़ से कुछ लम्हा गुज़रा,
आइने के साथ,
तो खुद को बर्दाश्त करने का भी,
हौसला न जुटा पाए।।।

चारुलता

Tuesday, 23 October 2018

तन्नू,😘

छोटी है तू पर,
खोटी नहीं,
हाँ ताने बहुत देती हूँ,
क्या करूँ, उम्मीद भी खुद से,
ज़्यादा तुझसे करती हूँ,
कुशाग्र, काईशा से तू,
थोड़ी बड़ी ही सही पर,
दीवानी हूँ मैं तेरी,
तू ये करले यकीन,
माँ बनने के बाद समझ,
पाई मैं, कोई फर्क नहीं जीवन,
में,क्योंकि पहले ही तेरी माँ बन,
बैठी थी मन में कहीं,
खयाल में तू ही रहती है,
कुछ करे या ना,
सब बेहतर है जब तू रहती है,
तेरे होने का एहसास मुझे,
खुशी दिलाता है,
तेरी वो हँसी, मुझे गुदगुदाता है,
तू जीवन मैं आनंदित रहे,
सफलता तेरे कदन चूमें,
बिना दांतों के भी हँसती रहे,
चुहियाँ मेरी तू सदा,
खुशी से चमकती रहे।

💞 तन्नू चुहियाँ
चारुलता

भैया - भाभी

मेरे अनमोल रतन,
तुम्हें पाकर दुनियां की सबसे,
रहीस बेहेन हूँ मैं,
मैं बहुत भाग्यशाली खुद को मसूस,
करती हूँ, जब खुद को आपकी बहन,
कहलाती हूँ।
भाई गर्व है तुझपर,
जो जीवन को सरलता से लेता है,
तेरे साथ कोई हो या न हो,
फैसले भी तू विनम्र होकर लेता है।
मेरी विडंबना तू शायद ही समझ पाए,
पर मैं निश्चिंत हूँ,
क्योंकि मेरे बचपन के आंगन को,
खिलाये रखने वाले तुम हो,
पुण्य किया है ज़रूर भारी मैन,
जो भाई तू, और भाभी वो है,
भईया तेरे प्यार की कोई सीमा नहीं,
तो भाभी में अपनेपन की मर्यादा नहीं।
भईया मेरी यादें अधूरी है आपके बिना,
मेरा बचपन खाली है तेरे बिना,
और मेरा आज इतना अच्छा ना होता,
आप दोनो के बिना।

💞 भईया - भाभी
चारुलता

पप्पा😘

पप्पा 😘

हाँ कदम मेरे छोटे थे,
तो लंम्बी दूरी कंधे पर तय हो जाती थी,
बिस्तर दूर था,
तो नींद गोध में ही लग जाती थी,
भाषा जाने मेरी क्या थी,
पर जवाब सब पा जाती थी,
पप्पा मेरी इन यादों की खुशबू,
आपके सीने से ही आती है।
समुंदर में इतना पानी नहीं,
जितना प्यार आपमे समाया है,
मेरे संसार में तरावट,
आपके हृदय से ही तो आया है,
चाहे कद में कितनी भी छोटी हूँ,
पर आपको पाके खुदको हमेशा बड़ा पाया है।
सर्दी में ठंड की फिक्र नहीं,
गर्मी में भी आराम पाया है,
पप्पा मेरे है तो जीवन में,
हर सुकून पाया है।
आज भी नहीं समझी,
किये थे क्या पुण्य,
जो आपको पाया है,
इस लायक ना थी फिर भी आपके कारण,
इन माँ-बाऊजी को पाया है,
करु हर बार वो कार्य,
जीसके कारण,
पिता के रूप में मैंने,
आप, पुरुस्कार पाया है।

💝 पिताश्री
चारुलता

माँ

सच माँ बोलने में जितना सुकून मिलता है,
उससे ज़्यादा सुनने में संतुष्टि मिलती है ।
सच्ची माँ शब्द बोलने में जितना प्यार भर जाता है,
सुनने मे उससे बहुत ज़्यादा लाड़ आता है।
माँ को आवाज़ लगाने मे जो बेफिक्री है,
सुनके गोद मे लेना उससे बहुत ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी है।
जन्म देके जननी तो फिर भी प्रकृति बनाती है,
लेकिन माँ खुद की गहराइयों से बनते है।
माँ एकाग्रता है,
माँ समर्पण है,
माँ ही ममता है,
माँ ही धैर्य है,
माँ...माँ है,
माँ ही आवाज़ है, माँ ही हृदय है
माँ माँ है।।।

चारुलता

सच वो माँ बहुत याद आती है

👩‍🌾जब  चलती है सर्द हवा,
वो काड़ा, गरम पानी की सलाह,
बहुत याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
जब चोट लगी,
वो मरहम, हल्दी का दूध,
यूँ सामने नज़र आता है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍💼सखी मुझे भी माँ के हाथ की,
बनी रोटी की हुक उठती है,
तो कभी बाल झड़ने पर,
सिर पर माँ की हथेली महसूस करती हूँ,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
यूँ अब यहाँ हूँ,
अपने घर में हूँ,
पर सच्ची सपने में घर नज़र आता है,
खिड़कियों पर से पर्दे हटाते,
माँ के कंगन सुनाई देते है,
सच सखी वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍🌾हाँ, जब दुबारा जन्म लिया,
इस घर में पहला कदम रखा,
मेरे हाथ को सहलाता,
उस हाथ की गरमाई याद आती है,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
घबराते हुए जब पहली बार कड़छी उठाई,
वो मसलों का ज्ञान देती,
अपनेपन की चादर उड़ाती,
वो प्यारी आवाज़ याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍🌾सखी तू तो तेरी माँ से मिल पाती है,
जिसने तुझे बड़ा कर विदा किया,
तुझे वो याद आती है।
मेरी वो माँ इस दुनियाँ में नहीं,
जिसने मुझे अपनाया,
ये घर मेरा घर है समझाया,
मुझे वो माँ बहुत याद आती है,
सखी बता मैं क्या करूँ,
मेरी हमसाथि माँ,
मेरी सासु माँ मुझे बहुत याद आती है।

🌼समर्पित उन माँओं को जो अपनी ममता,
कभी नहीं खोती, सींचती है आंगन प्यार से,
और बहुओं को विरासत में देती है लाड़ का बीज।🌼

चारुलता

Saturday, 7 July 2018

मेरी बेटी तू ही बता

मेरी बेटी,
अब तू ही बता दे, की ये क्या है,
तू मेरी चाहत है या,
मैं तेरी मर्ज़ी,
तू मुझे खुशी देती है,
या मैं तुझे सुकून।
अब तू ही बता दे, की ये क्या है,
मैंने तुझे जना है, या तूने मुझे बनाया है,
सीख रही हूं मैं, या समझ रही है तू,
तू ही बात, ना रक्खी कोई शर्त,
ना बाँधा मुझेे,
फिर भी रुकी हूँ तेरी ओर,
कोई शिकायत नहीं,
जो तुझे हो, तो बता,
ख्वाइश है तू मेरी,
सांसे तुझसे से ही चलती है।
ये तेरी मर्ज़ी हो या मेरी,
इस चाहत में खोये रहना चाहती हूँ,
इस प्रकृति का धन्यवाद,
कण-कण का धन्यवाद करना चाहती हूँ,
मैं तुझमे खो जाना चाहती हूँ।।।।

कायशा
चारुलता