👩🌾जब चलती है सर्द हवा,
वो काड़ा, गरम पानी की सलाह,
बहुत याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
जब चोट लगी,
वो मरहम, हल्दी का दूध,
यूँ सामने नज़र आता है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩💼सखी मुझे भी माँ के हाथ की,
बनी रोटी की हुक उठती है,
तो कभी बाल झड़ने पर,
सिर पर माँ की हथेली महसूस करती हूँ,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
यूँ अब यहाँ हूँ,
अपने घर में हूँ,
पर सच्ची सपने में घर नज़र आता है,
खिड़कियों पर से पर्दे हटाते,
माँ के कंगन सुनाई देते है,
सच सखी वो माँ बहुत याद आती है।
👩🌾हाँ, जब दुबारा जन्म लिया,
इस घर में पहला कदम रखा,
मेरे हाथ को सहलाता,
उस हाथ की गरमाई याद आती है,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
घबराते हुए जब पहली बार कड़छी उठाई,
वो मसलों का ज्ञान देती,
अपनेपन की चादर उड़ाती,
वो प्यारी आवाज़ याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩🌾सखी तू तो तेरी माँ से मिल पाती है,
जिसने तुझे बड़ा कर विदा किया,
तुझे वो याद आती है।
मेरी वो माँ इस दुनियाँ में नहीं,
जिसने मुझे अपनाया,
ये घर मेरा घर है समझाया,
मुझे वो माँ बहुत याद आती है,
सखी बता मैं क्या करूँ,
मेरी हमसाथि माँ,
मेरी सासु माँ मुझे बहुत याद आती है।
🌼समर्पित उन माँओं को जो अपनी ममता,
कभी नहीं खोती, सींचती है आंगन प्यार से,
और बहुओं को विरासत में देती है लाड़ का बीज।🌼
चारुलता
वो काड़ा, गरम पानी की सलाह,
बहुत याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
जब चोट लगी,
वो मरहम, हल्दी का दूध,
यूँ सामने नज़र आता है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩💼सखी मुझे भी माँ के हाथ की,
बनी रोटी की हुक उठती है,
तो कभी बाल झड़ने पर,
सिर पर माँ की हथेली महसूस करती हूँ,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
यूँ अब यहाँ हूँ,
अपने घर में हूँ,
पर सच्ची सपने में घर नज़र आता है,
खिड़कियों पर से पर्दे हटाते,
माँ के कंगन सुनाई देते है,
सच सखी वो माँ बहुत याद आती है।
👩🌾हाँ, जब दुबारा जन्म लिया,
इस घर में पहला कदम रखा,
मेरे हाथ को सहलाता,
उस हाथ की गरमाई याद आती है,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
घबराते हुए जब पहली बार कड़छी उठाई,
वो मसलों का ज्ञान देती,
अपनेपन की चादर उड़ाती,
वो प्यारी आवाज़ याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩🌾सखी तू तो तेरी माँ से मिल पाती है,
जिसने तुझे बड़ा कर विदा किया,
तुझे वो याद आती है।
मेरी वो माँ इस दुनियाँ में नहीं,
जिसने मुझे अपनाया,
ये घर मेरा घर है समझाया,
मुझे वो माँ बहुत याद आती है,
सखी बता मैं क्या करूँ,
मेरी हमसाथि माँ,
मेरी सासु माँ मुझे बहुत याद आती है।
🌼समर्पित उन माँओं को जो अपनी ममता,
कभी नहीं खोती, सींचती है आंगन प्यार से,
और बहुओं को विरासत में देती है लाड़ का बीज।🌼
चारुलता
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