Thursday, 16 June 2016

माँ

अरसा हुआ ये शब्द पुकारा नहीं,
जिसमे सृष्टि समाई है,
बोला सबने ये दुनियाँ,
उसी की सजाई है।
है ये शब्द बड़ा ही मीठा,
इसमें बड़ी गहराई है,
कहने की ये बात नहीं ,
सारी रचनाए इसी से आई है।
पर क्या करूँ,
हुआ अरसा इसे पुकारे,
वो प्यारी लहर ने कभी,
भिगोया नहीं,
उस ठहराव ने कभी थामा नहीं।
शायद इसलिए समय बिता यूँ,
तरसती रही मैं जीवन को यूँ।
जो इसमें अमृत रमाया है,
चखा मैंने इसे कभी नहीं।
जिसे अरसो से पुकारा नहीं,
डरती हूँ उसके लिए भी मैं,
माँ हैं मेरी, जननी हैं वो,
पर क्या करूँ दूर खड़ी है वो,
फूल वहाँ महकते नहीं,
कली वहाँ खिलती नहीं,
अँधेरे में वो रहती है,
भाव को चूर-चूर कर देती है,
रौशनी को आने देती नहीं,
घुटन को जाने देती नहीं।
एक ड़ोर थामे बैठी हूँ,
सब्र को दबोचे बैठी हूँ,
उम्मीद अभी भी छोड़ी नहीं,
शायद पुकारूँ में फिर कभी।......
चारुलता

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