Tuesday, 7 June 2016

अच्छा हुआ जो आज तूने मुझे रुला दिया

चल अच्छा हुआ आज
तूने मुझे रुला दिया,
अरसो बाद सही आँखें मेरी नाम तो हुई।
होठों को खिलाते-खिलाते,
पलखो को भींचना भूल गई
चल अच्छा हुआ आज तने मुझे रुला दिया
जीवन में गम को नज़रअंदाज़ करते-करते,
हक़ीक़त को अपनाना भूल गई,
सूख गया था जो दरिया,
उस माटी में नमी पंहुचा गया,
अच्छा हुआ जो तूने मुझे रुला दिया।
हँस-हँस के थक गई,
यूँ फूल चुगते-चुगते थक गई,
अच्छा हुआ जो काँटा चुब,
असलियत से तो सामना हुआ,
रोना भी ज़रूरी है,
आँख धोना भी ज़रूरी है,
अच्छा हुआ जो रुला दिया,
बहुत अच्छा हुआ जो आज ही रुला दिया,
समेटे हुए आंसुओं को बिखरा दिया।।।
चारुलता

Aur koi nahi

Kissi ko bura naa lage sochti hun,
Khud ki chahat ko chakna choor kr jati hun,
Sochti hun samjhenge log isharon se,
Jaane kyun khud ko zakham pahuchati hun..
Nahi aaya koi, naa hi aata hai,
Inn bikhari lehron ko sametne,
Jaane kyu phir bhi har baar,
Raat nahi chandani pe karti hun aitbaar,
Zehen mai hai sab phir bhi,
ladh baithti hun har baar,
Jaane kb tk rahungi khud se khafa,
Kab samjha paungi,
Mein hi mujhko apnaungi,
Koi aur nahi......

CharuLata....

पप्पा ये कैसी दुनियाँ है...

नहीं समझते है समझदार इशारों की भाषा,
पप्पा ये कैसी दुनियां है,
मेरे जीवन में आपने भरा प्यार,
जो है वही तो दे पाती हूँ,
पर क्या करूँ दुनियाँ इससे
कुछ और ही समझ जाती है,
पप्पा ये कैसी दुनियां है।।
सहज होना अच्छा है,
लेकिन यहाँ शोर इतना है की,
मंदी आवाज़ लोगों के कानो
तक पहुँचती नहीं,
अपनों की तकलीफों में आनंद लेते है,
बुराइयाँ करके महकते है,
ना समझने पर सर उठाके चलते है,
पप्पा ये कैसी दुनियाँ है।।।
लगता था जो पहले अच्छा,
मानती थी मैं जिसे सही,
इस दुनियाँ में रहकर,
इन लोगों के बीच,
खुदको पागल समझ बैठी हूँ,
अब खुद का साथ दे पाती नहीं,
पप्पा ये कैसी मैं हूँ।।।।

चारुलता

Wednesday, 1 June 2016

Technology का इस्तेमाल और प्यार क जीवन

कवियों की महफ़िल में
बैठने को मन तो बहुत करता है,
पर क्या करों अभी मेरा एक,
छोटा सा नन्हा सा बच्चा है,
जो हर क्षण माँ मुम्मी माँ करता रहता है,
अभिमान बहुत करती हूँ उसके प्यार पर,
पर दुनिया का क्या,
disturbe होती है हर बात पर,
उसकी किलकारी मेरे जीवन मरुथल
को महकाती है,
लेकिन ये दुनियादारी बहुत अखर जाती है,
खुद के बच्चों से बात करने की
टाइम लिमिट बांधते है,
जो समय ना मिले तो,
गेम्स, मोबाइल उनके जीवन में दे मारते है।
हाँ मैं कुछ अलग करना चाहती हूँ,
मैं आज जैसा नहीं, गुज़रे कल
जैसा जीना चाहती हूँ।
नहीं- नहीं दुनियाँ से दूर नहीं,
लेकिन रिश्तों के करीब,
बड़ों की छाँव में गुज़रना चाहती हूँ,
नयी technology का इस्तेमाल करना,
और प्यार को जीवन बनाना चाहती हूँ,
मेरे बच्चे के जीवन में सच्चे रंग भरना चाहती हूँ।।।

चारुलताजीवन

बचपन बड़ा ही सच्चा था

जीवन बड़ा ही अच्छा था,
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था।
रेत में घर बनाते थे,
गिट्टी में उछल-कूद मचाते थे,
मकान की कोई चाह नहीं,
वो घर, घर नहीं जहाँ बड़ों की छाँव नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
क्या नया, क्या पुराना,
जो भी मिला, पहेनकर
खेलने जाना,
दिखावे की कोई ललक नहीं
वो उचाइयां ही क्या
जहाँ अपनों की साथ नहीं।
वो बचपन बड़ा ही सच्चा था,
कागज़ को विद्या कहते थे,
कलम की कदर हम करते थे,
नोट को मोस के जेब में धरते थे,
धन-दौलत का कोई लालच नहीं,
वो जायदात ही क्या जिसमे
बड़ों की मुस्कान नहीं।
वो बचपन बड़ा ही अच्छा था,
मीठे-मीठे प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाना,
मंदिर में प्रभु के साथ खेलके आना,
कोई शक नहीं, कोई शिकायत नहीं,
वो मांगना ही क्या,
जिसमे तुम्हारा कोई हक़ नहीं।
सच वो जीवन बड़ा ही अच्छा था,
हकीक़त में बचपन बड़ा ही सच्चा था।।

चारुलता

Monday, 14 September 2015

Galiyan hai ya sakhi hai

Chand galiyan hai abhi bhi,
Jo apni si jaan padhti hai,
Sachi bolu to guzrun jab bhi,
Sakhi si jaan padhti hai...
Reh gai hai kuch galiya kacchi, jo mujhe mujhe dekh muskati hai....
Jaane wo kaisi khushboo hai jo mere zehen mai samai hai,
Inn galiyon mein wo aaj nahi lekin mujhe wahi yaad aai hai...
Mein bhi badal gai hu ab, lekin ye galiya waise hi milne aai hai,
Sakhiya nahi, wo khel nahi,
Dhappi kehkr hasne wala koi nahi, pithu jamakr ladhne wala koi nahi,...
Phir bhi ye galiya khilkhilai hai, yaadon ke phool itne meheke hai ki samunder mein lehrein aai hai...
Ye galiya phir se meri sakhi sang lai hai...

Khud se kab mill paunga

Karta hu abhimaan yun ki mujhse accha koi nahi,
Lekin ye sacchai hai ki mujhme kamiya hai abhi kai,
Dikhata hu sansaar ko yun ki bahut bada ho gaya hu mein,
Lekin ye sacchai hai,
Abhi chhoti baaton ko samjha nahi,
Hasta hu hasata hu, rokar bhi dikhata hu,
Phir bhi asal mein bhavnao ko kai thukraata hu,
Mein MEIN HU ye keh keh kr chillata hu,
Asal mein kya hu ye zehen mein aata nahi,
Aisa pal kab aayega jab mein aine ko dekh muskuraunga,
Khud se milkr chehek uthunga, aapni awaaz mein gungunaunga...
Tab sansaar nahi,
Mere andar ki duniya jaanegi mujh apne ko,
Kar paunga khudse baatein chand, sacchi hasi has paunga apnoke sang......