Tuesday, 23 October 2018

माँ

सच माँ बोलने में जितना सुकून मिलता है,
उससे ज़्यादा सुनने में संतुष्टि मिलती है ।
सच्ची माँ शब्द बोलने में जितना प्यार भर जाता है,
सुनने मे उससे बहुत ज़्यादा लाड़ आता है।
माँ को आवाज़ लगाने मे जो बेफिक्री है,
सुनके गोद मे लेना उससे बहुत ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी है।
जन्म देके जननी तो फिर भी प्रकृति बनाती है,
लेकिन माँ खुद की गहराइयों से बनते है।
माँ एकाग्रता है,
माँ समर्पण है,
माँ ही ममता है,
माँ ही धैर्य है,
माँ...माँ है,
माँ ही आवाज़ है, माँ ही हृदय है
माँ माँ है।।।

चारुलता

सच वो माँ बहुत याद आती है

👩‍🌾जब  चलती है सर्द हवा,
वो काड़ा, गरम पानी की सलाह,
बहुत याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
जब चोट लगी,
वो मरहम, हल्दी का दूध,
यूँ सामने नज़र आता है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍💼सखी मुझे भी माँ के हाथ की,
बनी रोटी की हुक उठती है,
तो कभी बाल झड़ने पर,
सिर पर माँ की हथेली महसूस करती हूँ,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
यूँ अब यहाँ हूँ,
अपने घर में हूँ,
पर सच्ची सपने में घर नज़र आता है,
खिड़कियों पर से पर्दे हटाते,
माँ के कंगन सुनाई देते है,
सच सखी वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍🌾हाँ, जब दुबारा जन्म लिया,
इस घर में पहला कदम रखा,
मेरे हाथ को सहलाता,
उस हाथ की गरमाई याद आती है,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
घबराते हुए जब पहली बार कड़छी उठाई,
वो मसलों का ज्ञान देती,
अपनेपन की चादर उड़ाती,
वो प्यारी आवाज़ याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍🌾सखी तू तो तेरी माँ से मिल पाती है,
जिसने तुझे बड़ा कर विदा किया,
तुझे वो याद आती है।
मेरी वो माँ इस दुनियाँ में नहीं,
जिसने मुझे अपनाया,
ये घर मेरा घर है समझाया,
मुझे वो माँ बहुत याद आती है,
सखी बता मैं क्या करूँ,
मेरी हमसाथि माँ,
मेरी सासु माँ मुझे बहुत याद आती है।

🌼समर्पित उन माँओं को जो अपनी ममता,
कभी नहीं खोती, सींचती है आंगन प्यार से,
और बहुओं को विरासत में देती है लाड़ का बीज।🌼

चारुलता

Saturday, 7 July 2018

मेरी बेटी तू ही बता

मेरी बेटी,
अब तू ही बता दे, की ये क्या है,
तू मेरी चाहत है या,
मैं तेरी मर्ज़ी,
तू मुझे खुशी देती है,
या मैं तुझे सुकून।
अब तू ही बता दे, की ये क्या है,
मैंने तुझे जना है, या तूने मुझे बनाया है,
सीख रही हूं मैं, या समझ रही है तू,
तू ही बात, ना रक्खी कोई शर्त,
ना बाँधा मुझेे,
फिर भी रुकी हूँ तेरी ओर,
कोई शिकायत नहीं,
जो तुझे हो, तो बता,
ख्वाइश है तू मेरी,
सांसे तुझसे से ही चलती है।
ये तेरी मर्ज़ी हो या मेरी,
इस चाहत में खोये रहना चाहती हूँ,
इस प्रकृति का धन्यवाद,
कण-कण का धन्यवाद करना चाहती हूँ,
मैं तुझमे खो जाना चाहती हूँ।।।।

कायशा
चारुलता

Wednesday, 26 April 2017

बचपन दौहराती हूं


तुझमे अपना बचपन दौहराती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
तुझपे जब भी लाड़ लुटाती हूँ,
मेरे माँ-बाऊजी की गोध में खेल आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
जब भी तेरी अठखेलियों पे मुस्कुराती हूँ,
मम्मी-पप्पा को महसूस कर आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
जब गुस्सा करते-करते हँस जाती हूँ,
तब अपने मइके के आँगन में गुडलिया चल आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
तेरे हुंकारों में, बड़ों के प्यार को समझ जाती हूँ,
तेरे आने से, मेरा अस्तित्व जान पाती हूँ,
कितनी साधारण है ये ज़िन्दगी,
कितना प्यार है इस जीवन में,
तुझे देख-देख खुद को याद दिलाती हूँ,
तुझमे अपना बचपन दौहरती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।।।

चारुलता

Saturday, 25 February 2017

पिंजरा या घर

यहाँ पिंजरे को लोग घर कहा करते है,
दरवाज़े तो दूर, जाली वाली खिड़कियां,
भी तंग खुला करती है,
रसोई की महक तो नहीं,
आस-पास के हाल-चाल को भी,
तांक-झांक समझ लेते हैं,
यहाँ पिंजरे को लोग घर कहते है।
घर के नाम से चेहरे कस लेते है,
छुट्टी के दिन भी बाहर मस्त रहते है,
मेहमान ना आए डर-डर के रहते है,
माँ-बापू को गाँव में अकेला रहने देते है,
यहाँ पिजरे को लोग घर का नाम देते है।
बच्चों को खेलने जाने नहीं देते है,
मेल-जोल से दूर मॉल में खिला लेते है,
बांटके नहीं भीड़ में अकेले,
Ice-cream चखा देते है।
यहाँ पिंजरे मे लोग,
बड़े शेहेर में रहते है,
ऐसा कहते है।।।।।

चारुलता

Tuesday, 14 February 2017

आज के चुटुकुले

 हांजी हस्ती हूँ मैं भी,
हँसी तो आ ही जाती है,
जो चुटुकुलों का स्तर गिरा है,
शायद उसी पे आती है,
कितना आसान है,
एक माँ की ममता की हँसी उड़ान,
एक बीवी के विश्वास की खिल्ली उड़ान,
एक बहु के समर्पण का मज़ाक उड़ान,
चुटुकुलों की आग से कुछ तो जल रहा है,
संस्कार धुआं बनकर उड़ रहा है,
बनते थे चुटुकुले हँसाने के लिए,
नहीं बनते थे किसी को चुभाने के लिए,
मज़ाक में हाथी की शादी चींटी से होती थी,
लेकिन अब औरत की तुलना चुड़ैल से होती है,
जो सावित्री यम से अपने सुहाग ले आती है,
आज उसका रूप बदल,
करवाचौथ पे अपने,
 पति से पैर धुलवाती है,
 आदमी के सुख की कामना,
 तो आज भी वही औरत करती है,
"गर दुनियां में आज सावित्री नहीं होती है,
तो कौनसा सत्यवान भी जनम लेता है,
 ऊपर वाला जोड़ी बनाकर भेजता है,
 चुड़ैल के साथ तो प्रेत ही होता है",
अगर डरती है थोड़ा,
तो क्या ग़लत करती है,
दुनियां की मायने बदल रही है,
लेकिन स्त्री के अस्तित्व का मज़ाक बनाना,
 चुटकुला है समझकर हँसी तो आती है,
 लेकिन इसमें कोई अच्छाई नज़र नहीं आती है,
 फिर भी स्त्री की शक्ति का अंदाज़ा हो जाता है,
जब औरतें महफिलों में,
इन चुटुकुलों पर हँस देती है,
और जो खुद व्यंग है,
उन्हें भी बक्श देती है।।।।
चारुलता

Tuesday, 7 February 2017

Beti wo hi hai

Kyu ek beti ko har baar batana padhta hai,
Naa Maa tera beta tera hi hai,
Tu hi to chahti hai ki mein uska,
acche se khayal rakkhun,
Jo uske dil mai gajah kr gai to kya hai,
Kyun ek beti ko har baar samjhana padhta hai,
Naa ji mein sabko apna manti hun,
Tu hi chahti hai ki sab khush rahe,
Jo mera samarpan kissi ko bhaya to kya,
Kyun ek beti ko har baar jatana padhte hai,
Naa Maa ab ye mera bhi ghar hai,
Tu hi chahti hai ki ye phale- phoole,
Jo mujhe sarwasreshtha lagta hai,
Maine kiya,
Jaise tune apnaya, waise maine sameta,
Jaise sab tera hua, waise mein bhi sabki bani,
Kyu har beti ko har baar... Baar baar ,
Batana padhta hai Maa tu bhi beti hai,
Waise hi mein beti hun,
Tu Aaj maa hai mein ban rahi hun,
Kyu Maa aapne hi kal ko swikaar nahi pati,
Kyu Maa apne bhavishaya se mukalbla krti hai,
Kyu Maa bhool jaati hai,
Beti aaj bhi hai aur kal bhi
Beti wo hi hai bas kal wo thi aaj ye hai.......
CharuLata