Thursday, 24 September 2020

तू तो एक प्राणी मात्र है


किस छल-कपट से जी दुखाता है,

किस झूठ से आंखे नम है,

किस छलावे से भारी-भारी मन है,

तू तो सिर्फ एक प्राणी मात्र है।।

जो पेड़ छाया-सुख देता है,

जिसका फल स्वाद-आनंद दिलाता है,

जिसकी डाल पे सखी-संग झूला,

जीवन मरुथल चाशनी सा गोते लगाता है,

इंसान उसे बेझिझक काट देता है,

फिर तू तो एक प्राणी मात्र है।।

जो धरती बोझ उठाती है,

सीना चीर अन्न दान देती है,

जो सबको थामे रखती है,

माँ कहता है फिर भी,

इंसान बेझिझक थूक देता है,

फिर तू तो एक प्राणी मात्र है।।

जो शक्ति है,

सम्पूर्ण जगत की पालन-कर्ता है,

रूप अनेक पर अर्थ तो एक है,

इंसान बेझिझक जब उसे ही, 

नकारता है,

होनी को अनदेखा कर, पाप कर,

इंसान बेझिझक खुद को धोका देता है,

फिर तू तो एक प्राणी मात्र है,

तू तो एक प्राणी मात्र ही है।।।

रुक जा, संभल जा,

खुद को बदलने मत दे,

मुस्कुरा, सही राह चुनता जा,

ईश्वर तेरे संग है,

तू तो कहता है,

तू एक प्राणी मात्र है,

पर प्रभू के लिए तू प्रेम-पात्र,

संतान-मात्र है।।।


चारुलता

Saturday, 9 May 2020

Women's day

हमारे बुज़ुर्ग सच्ची बहुत ही समझदार थे,
इसलिए लड़कियों को घर पे और ,
लड़को को पाठशाला पढ़ने भेजा करते थे,
पढ़ाई लिखाई से, पाठ करने से दिमाग खुलता है,
आदमी किसी लायक बनता है,
आदमी किसी तो लायक बनेगा,
औरतें जन्म से ही जिम्मेदार होती है,
ज़्यादातर,
बिना पाठशाला में गणित पढ़े,
घर खर्च चलाती है,
Economics कठिन होगा कइयों के लिए,
लेकिन economics का मूल तो मेरी दादी ने,
मुझे बचपन में ही सिखा दिया,
कब क्या खरीदना है,
हिसाब से कैसे चलना है,
और Savings,
Savings के तारीखे औरतों से बेहतर,
कोई नही जनता,
अनजाने में ही सही Science की प्रोफेसर,
होती है, खाने में नामक कब डालना है,
किस सब्ज़ी में कौनसा मसाला,
किस अनुपात में डाला जाएगा,
अरबी में अजवाइन, कड़ी में पंचकूट,
खटाई में राई का छौंक,
सिर्फ स्वाद का खेल नहीं, सेहत के लिए,
क्या है लाभदायक, डॉक्टर से पहले,
औरत बताती है इलाज,
तो क्या हुआ sociology नहीं पढ़ा,
लेकिन पढ़े लिखों से ज़्यादा,
हमारी बड़ी बताती थी कचरा इधर उधर मत फेको,
घर में झाड़ू भी तो वही लगाती थी,
गिला सुख अलग रखो,
रसोई में हाथ धोये बिना ना घुसों,
घर मैं चप्पल  न पहनों,
शनिवार को तेल की मालिश करवालों,
ऊपर वाले का नाम जाप लो।
बाप रे list पूरी होती नहीं,
और आदमी है जो आज भी सीखता नहीं।
मेरी 2 साल की बेटी चीजें जगह पे,
रखती है, खाने के बाद बर्तन मांजने में,
रखती है।
लेकिन मेरी सहेली का पति आज भी,
T.v , पंखा, लाइट, गीज़र खुला छोड़ता है,
खुद की फ़ाइल ढूंढते समय रोज़ अपनी बीवी,
पे चिड़चिड़ाता है।
आइंस्टीन को स्कूल से निकले जाने पर,
उनकी माँ ने उन्हें पढ़ाया था,
नारायण मूर्ति infosys के मालिक है,
लेकिन उनका साथ, उनके घर का सिस्टम,
सब उनकी बीवी ने संभाल था।
विडंबना असल में ये है,
औरत का समर्पण ही उसे मोक्ष,
से दूर करता है,
सबको संभालते-संभालते, वो डोरियाँ,
उसके उंगलियों में ऐसे घुस जाती है,
कभी बच्चों से ममता में, कभी पति के मोह में,
कभी फ़र्ज़ तो कभी संस्कार, कुछ न कुछ,
आड़े आता है,
खेलने, सजने के शौक को छोड़,
Cooking को अपना carrer बना लेती है,
सफाई, नर्सिंग, धोबी, interior में,
एक्सपर्ट बन जाती है।
घर में ताकत माँ ही लाती है,
जो पहले औरत और उससे पहले लड़की
होती है।
इतना संभालने पर भी,
ये दुनियाँ पति को देवता इसलिए
कहती है, क्योंकि महारानी होने पर,
सीता ने नहीं,
अहम कभी मंदोदरी में नहीं,
एक बेटी , पत्नी, बहु माँ बनने
के बाद, मायके में नहीं,
कोई परीक्षा, अपेक्षा, स्वार्थ वो रखती नहीं,
अपनाने की शक्ति धरती माँ में है,
समुद्र तो कचड़ा निकल फेकता है,
सृजिन की शक्ति, बहने की शक्ति,
सींचने की शक्ति,
औरत देवी नहीं, माँ बनकर ही खुश है,
वो आज भी प्रकृति से जुड़ी है,
हेम पुत्री होकर भी कैलाश में,
वैरागी संग घर बसाती है,
महालक्ष्मी होकर भी विष्णु के पैर दबाती है,
स्व ब्रम्हाड़ी होकर, रचयिता ब्रह्मा को कहलाती है,
आदमी के अहम को,
उसके नाजायज़ अहम को,
औरत ही शांत कराती है,
औरत ही शांत कराती हैं।.....

चारुलता



लॉकडौन

मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा,
बड़े दिन हुए कुछ लिखा नहीं,
तुमने कुछ नया भेजा नहीं,
लॉकडौन है कुछ तो फायदा उठाओं,
अपनी creativity दिखाओं।
मैंने कहाँ हांजी लॉकडौन है, तभी तो,
Creativity हड़ताल पे है,
मित्र बोलै ऐसे-कैसे,
मैंने कहाँ भाईसाहब ऐसे..
आप बेटे है,पति है एक बार औरत बनकर देखें,
तो जान पाएंगे,की आम दिनों,
का जो timebreak,हम औरतें,
कुछ लिखने,पढ़ने,बनाने,सिलने,
कुछ कसरत,या लंबी सांस लेने में,
इस्तेमाल करती थी,अब वो भी,
मुए कोरोना के कारण छिन गया है,
तुम लंबे लॉकडौन के चलते डर रहे हो,
घरबार औरतें भी रही है सब्ज़ी के बढ़ते दाम देखकर,
तुम घर में बैठे-बैठे bore हो गए हो,
थक औरतें भी गई है बच्चों को घर में खुश,
रखने की तरकीबें सोच कर,
तुम्हे नींद नहीं आती,office जो गए नहीं,
दोस्तों से मिलें नहीं,जाम जो टकराएं नहीं,
हमें नींद आती नहीं,कल किसकी मर्ज़ी का बनाना है,
Homework के साथ Classwork भी तो समझना है,
गर्मी में परिवार को हँसाना है,
और दुखती कमर पर कल ज़रूर बाम लगाना है।
कुछ अच्छे पति साथ देते है,
लेकिन इस मुए कोरोना के कारण,
जो औरतों पे संकट आया है,
श्राप ज़रूर लगेगा,जल्दी भस्म होगा,
औरत की आह में शक्ति बहुत होती है,
एक माँ के क्रोध में अग्नि बहुत होती है।

चारुलता

सफ़ेद बाल

बड़ी जल्दी तुम्हारे नन्हें पैर, मेरी गोद से बाहर भागने लगे,
बड़ी जल्दी मेरा आँचल छोड़, खिलोने, पेंसिल उठाने लगे,
तुम्हारे पीछे भागते-भागते मेरी सांसें फूलने लगी,
जो गोद में उठाया तो मेरी कमर बोलने लगी,
तुम्हे तैयार करते -करते जो आईने से नज़र मिली,
तब जाके सफेद बालों से मेरी मुलाकात हुई,
हकीकत से सामना हुआ तो जाना,
"तुम तो बहुत young दिखती हो"
"बड़ी slim हो, क्या करती हो"
ये सुनते और तुम्हे देखते सब भूल गई थी,
तुम बच्चों की चमत्कारी दुनियाँ में खो गई थी,
तभी तो इतने सालों, महीनों, घंटों को जल्दी कह रही थी,
भई खो-खो हो या कबड्डी, volley-ball हो या फिर
High-jump, सिलाई, बुनाई, painting या drawing,
Cooking, anchoring, interviews, non-stop working,
कभी मैं पीछे हटी नहीं, आज में कैसे बैठ गई,
अपनी उम्र से मैं दोस्ती करने लगी।।।
अब समझी क्यों ज़रा से खटके से बड़ों की डांट,
खाते थे, बेवजह शोर से बड़े क्यों डर जाते थे,
उम्र का लिहाज़ था भैया, उम्र का लिहाज़ है,
औरत हूँ इसलिए औरत के भाव प्रकट करती हूँ,
पिता की बेटी हो या भाई की बहन,
पति की पत्नी हो या बच्चों की माँ,
फिक्र से बेफिक्र कभी हो नहीं पाती,
औरतों की खुद से मुलाकातें तंग,
और खुद की फिक्र हो नहीं पाती।।।

चारुलता

Sunday, 26 January 2020

मॉं ने औरत को स्वार्थी बना दिया

ना सर्दी ने कभी उसे सिकुड़ा था,
ना ही गर्मी में हताश हुई,
पानी बरसा कितना भी,
चाहे वो बीमार हुई,
मुस्कुराती रहती थी,
सुबह की जल्दी - रात की देरी,
कभी उसे नहीं सताती थी,
पर ये क्या,,, आज उसे मैंने,
हाथ नम करते देखा है,
काम करते हुए पहली बार चिड चिड़ाते देखा है,
खाना बनाने की जल्दी में देखा है।
औरत, मां बनते ही बदल गई,
लगता है कमज़ोर हुई।
हां। अब समझी, ममता ने उसे झुका दिया,
या ऐसा कहूं बहुत कुछ सीखा दिया,
मेरी नन्ही सी जान को सर्दी ना पकड़े,
तो उसे पकड़ने वाले हाथों को मां ने नम किया,
मेरे बच्चे की एक आह! ने मां को काम के प्रति ,
चीड़ चिडा बना दिया,
मेरी जान की आंख से आंसू गिरने से पहली ,
मां ने खाना हड़ बड़ी में बना दिया।
ममता ने औरत को मां बना दिया,
औरत जो सबके लिए करती थी,
मां को थोड़ा स्वार्थी बना दिया,
ममता ने उसे खुद के लिए,
समय निकालना सीखा दिया,
उस खुद के लिए जिसमें वो खुद को जीती है,
ममता ने मां को स्वार्थी बना दिए,
मां को आईना निहारना छुडा दिया।।

चारूलता

Wednesday, 24 April 2019

मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ

सब कहते हैं मैं बड़ी हुई हूँ,
पर मैं तो अभी-अभी छोटी हुई हूँ,
सब कहते है अब संभल गई हूँ,
लेकिन अभी-अभी तो खेलना,
सीख गई हूँ,
इंसान की सोच और प्रकृति,
के नियमों में फर्क ही बहुत है,
प्रकृति ने जब मुझे सबसे खूबसूरत,
प्यारे खिलोने दिए,
तब इंसानो के रीती-रिवाजों ने,
मुझे बहुत उलझा दिया,
जब ये खिलोने, निखरने लगे,
तब इंसानो के नियमों ने मुझे,
हँसना भुला दिया, बहुत थका दिया,
छोटी हूँ पर ज़िम्मेदार हूँ,
खुश रहना जानती हूँ,
खुश रहने का हक़ है,
तभी तो प्रभु ने इतने सूंदर,
तोहफों से नवाज़ा है,
सब कहते है मैं बड़ी हो गई हूँ,
लेकिन मैं एक छोटी सी,
खुशनसीब,
कुशाग्र और काईशा की,
माँ बन गई हूँ।।।

चारुलता

वसूली वाला ऊपर वाला

तू बना था प्यार समझने के लिए,
तू बना था भरोसा करने के लिए,
तू बना था भक्ति-भाव जगाने के लिए,
रूप दिया तुझे एकाग्रता बढ़ाने के लिए,
पर तेरे प्रेम को इस्तेमाल करते है,
बहकाने के लिए,
भरोसा, डर की घुटन में फसा है,
भक्ति-भाव को तोड़-मरोड़ कर,
अंध-विश्वास के क़दमों में दबोच रक्खा है,
और तेरे रूप का क्या कहना,
जो सूंदर है, सरल है, साधारण है,
ऐसा रूप कहाँ छिपा बैठा है,
एकाग्रता खंडित करने को,
सूंदर गहने, और वस्त्रों का लाग-लपेट,
कर रूप जो बनाया है,
तू अंतर्मन है,
ऊपरी प्रपंच बना रक्खा है,
तू शांति है,
दिखावे का ढोल बना रखा है,
ये संसार तू है, और तुझमे ये,
संसार है,
फिर भी तुझे संसार से परे बना रखा है,
क्या सोचता होगा तू भी बैठा-बैठा,
तुझे तो इंसान ने वसूली करने वाला,
बना रखा है।

चारुलता

Monday, 1 April 2019

आप जैसी

जैसे-जैसे बड़ी हो रही हूँ,
वैसे-वैसे जानती जा रही हूँ,
मैं तो आपके जैसी ही ,
बनती जा रही हूँ।
आज आईने के सामने खड़ी हुई,
तो नज़रों में आप है,
बाऊजी, मेरा नज़रिया, आप,
मैं आप जैसा सोचने लगी,
मैं आप बनती जा रही हूँ।
माँ थोड़ा आराम करो, अब थोड़ी
ढील तो दो, आज मैं यूँ ही सख्त,
खड़ी रही, जाने कैसे ढल गई,
माँ मैं तो आप बनती जा रही हूँ।
पप्पा ,कुछ अलग करिये,
नया करते है,
कहती बहुत हूँ, पप्पा,
मैं आपसे महकने लगी हूँ,
मैं आप जैसी बनती जा रही हूँ।
ग़लत करती हो मम्मी, करते-करते,
मैं भी ग़लत कर जाती हूँ,
मम्मी जैसी हूँ मैं भी, ये भी सोच
मैं पति हूँ।
मीना बुआ बहुत सोचती है,
थोड़ा संभालो, कहते-कहते,
कब सोच में डूब गई,
और ऐसे ही बह गई,
बुआ मैं आप जैसी बनती जा रही हूँ।
बेबा बुआ हस्ती है, हर
गम को चबा जाती है,
जाने मैं कब बुआ से सीख गई,
जाने मैं कब रोना भूल गई,
लल्ला बुआ मैं आप जैसी बनती
जा रही हूँ।
मैं जानती हूँ इन सबको,
पहचानती हूँ इन सबको,
क्योंकि खुद से रोज़ मुलाकात करती हूँ,
ग़लतियाँ भी जानी-भुजी लगती है,
फिर भी दोहरा मैं जाती हूँ,
मैं अपने आपमे इन सबको जीता पाती हूँ,
बदमशयों मैं भैया,
शैतानियों मैं तन्नू नज़र आती हूँ ,
और ये सब मैं, अमी,
आपके सामने सुलझा पाती हूँ,
अमी मैं तो आपके जैसी बनती जा रही हूँ।

चारुलता

Monday, 14 January 2019

देखा नही मैंने कभी पर जिया है मैंने इसे कभी



Dekha nahi maine abhi,
Pr jiya hai maine isse kabhi,
Ek gaun hai bada sunder sadharan saa,
Jahan beeta hai bachpan hasi-hasi....
Dekha nahi maine abhi
Kashtiyon ki unchi udaan thi,
Bejhijhak lehlehati awaaz thi,
Jaane phool kaise dikhte they magar aangan mein sabke mehekte they,
Jiya hai maine isse kabhi....
Dekha nahi maine abhi
Wo naure mein dadi wale baba,
Wo buao ki hasi thitholi,
Wi bhai beheno ka ruthna manana,
Phir ek khat pr milkr soo jaana,
Jiya maine isse kabhi....
Bin dekhe jiya hai jo,
Bin mange paaya hai wo,
Mere dada ke sangh ghumi hu,
Jo abhi nahi par,
Tab tha wo.....
Rabdi ho ya jalebi,
Bhajiye ho ya kachori,
Aaj inme wo swad nahi,
Bauji sangh chakhe they jo
Unn jaisi kissi mai baat nahi...
Dekha nahi maine abhi
Wo bade aangan mein chaar kadam,
Wo kaju, kishmish,baadaam ke dhan,
Wo ghod, Unth ka dar pr hona,
Wo hanthon mein khan-khan kangana,
Jiya maine isse kabhi....
Milli nahi mein jinse abhi,
Hansi hun unke sangh kabhi,
Mere bauji ne milaya hai,
Sabkuch mujhe bataya hai,
Apne tajurbon se sikhaya hai,

Maine andekha wo ,
Anmol ratan paaya hai...

Mere bauji ne dekha sabhi,
Pr jiya hai maine kabhi - kabhi...

चारुलता

Monday, 26 November 2018

शायरी

अर्ज़ किया है

जो नज़र फेरी तो ,
बड़े ही ज़ालिम नज़र आए,
इत्तेफ़ाक़ से कुछ लम्हा गुज़रा,
आइने के साथ,
तो खुद को बर्दाश्त करने का भी,
हौसला न जुटा पाए।।।

चारुलता

Tuesday, 23 October 2018

तन्नू,😘

छोटी है तू पर,
खोटी नहीं,
हाँ ताने बहुत देती हूँ,
क्या करूँ, उम्मीद भी खुद से,
ज़्यादा तुझसे करती हूँ,
कुशाग्र, काईशा से तू,
थोड़ी बड़ी ही सही पर,
दीवानी हूँ मैं तेरी,
तू ये करले यकीन,
माँ बनने के बाद समझ,
पाई मैं, कोई फर्क नहीं जीवन,
में,क्योंकि पहले ही तेरी माँ बन,
बैठी थी मन में कहीं,
खयाल में तू ही रहती है,
कुछ करे या ना,
सब बेहतर है जब तू रहती है,
तेरे होने का एहसास मुझे,
खुशी दिलाता है,
तेरी वो हँसी, मुझे गुदगुदाता है,
तू जीवन मैं आनंदित रहे,
सफलता तेरे कदन चूमें,
बिना दांतों के भी हँसती रहे,
चुहियाँ मेरी तू सदा,
खुशी से चमकती रहे।

💞 तन्नू चुहियाँ
चारुलता

भैया - भाभी

मेरे अनमोल रतन,
तुम्हें पाकर दुनियां की सबसे,
रहीस बेहेन हूँ मैं,
मैं बहुत भाग्यशाली खुद को मसूस,
करती हूँ, जब खुद को आपकी बहन,
कहलाती हूँ।
भाई गर्व है तुझपर,
जो जीवन को सरलता से लेता है,
तेरे साथ कोई हो या न हो,
फैसले भी तू विनम्र होकर लेता है।
मेरी विडंबना तू शायद ही समझ पाए,
पर मैं निश्चिंत हूँ,
क्योंकि मेरे बचपन के आंगन को,
खिलाये रखने वाले तुम हो,
पुण्य किया है ज़रूर भारी मैन,
जो भाई तू, और भाभी वो है,
भईया तेरे प्यार की कोई सीमा नहीं,
तो भाभी में अपनेपन की मर्यादा नहीं।
भईया मेरी यादें अधूरी है आपके बिना,
मेरा बचपन खाली है तेरे बिना,
और मेरा आज इतना अच्छा ना होता,
आप दोनो के बिना।

💞 भईया - भाभी
चारुलता

पप्पा😘

पप्पा 😘

हाँ कदम मेरे छोटे थे,
तो लंम्बी दूरी कंधे पर तय हो जाती थी,
बिस्तर दूर था,
तो नींद गोध में ही लग जाती थी,
भाषा जाने मेरी क्या थी,
पर जवाब सब पा जाती थी,
पप्पा मेरी इन यादों की खुशबू,
आपके सीने से ही आती है।
समुंदर में इतना पानी नहीं,
जितना प्यार आपमे समाया है,
मेरे संसार में तरावट,
आपके हृदय से ही तो आया है,
चाहे कद में कितनी भी छोटी हूँ,
पर आपको पाके खुदको हमेशा बड़ा पाया है।
सर्दी में ठंड की फिक्र नहीं,
गर्मी में भी आराम पाया है,
पप्पा मेरे है तो जीवन में,
हर सुकून पाया है।
आज भी नहीं समझी,
किये थे क्या पुण्य,
जो आपको पाया है,
इस लायक ना थी फिर भी आपके कारण,
इन माँ-बाऊजी को पाया है,
करु हर बार वो कार्य,
जीसके कारण,
पिता के रूप में मैंने,
आप, पुरुस्कार पाया है।

💝 पिताश्री
चारुलता

माँ

सच माँ बोलने में जितना सुकून मिलता है,
उससे ज़्यादा सुनने में संतुष्टि मिलती है ।
सच्ची माँ शब्द बोलने में जितना प्यार भर जाता है,
सुनने मे उससे बहुत ज़्यादा लाड़ आता है।
माँ को आवाज़ लगाने मे जो बेफिक्री है,
सुनके गोद मे लेना उससे बहुत ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी है।
जन्म देके जननी तो फिर भी प्रकृति बनाती है,
लेकिन माँ खुद की गहराइयों से बनते है।
माँ एकाग्रता है,
माँ समर्पण है,
माँ ही ममता है,
माँ ही धैर्य है,
माँ...माँ है,
माँ ही आवाज़ है, माँ ही हृदय है
माँ माँ है।।।

चारुलता

सच वो माँ बहुत याद आती है

👩‍🌾जब  चलती है सर्द हवा,
वो काड़ा, गरम पानी की सलाह,
बहुत याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
जब चोट लगी,
वो मरहम, हल्दी का दूध,
यूँ सामने नज़र आता है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍💼सखी मुझे भी माँ के हाथ की,
बनी रोटी की हुक उठती है,
तो कभी बाल झड़ने पर,
सिर पर माँ की हथेली महसूस करती हूँ,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
यूँ अब यहाँ हूँ,
अपने घर में हूँ,
पर सच्ची सपने में घर नज़र आता है,
खिड़कियों पर से पर्दे हटाते,
माँ के कंगन सुनाई देते है,
सच सखी वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍🌾हाँ, जब दुबारा जन्म लिया,
इस घर में पहला कदम रखा,
मेरे हाथ को सहलाता,
उस हाथ की गरमाई याद आती है,
सच्ची वो माँ बहुत याद आती है।
घबराते हुए जब पहली बार कड़छी उठाई,
वो मसलों का ज्ञान देती,
अपनेपन की चादर उड़ाती,
वो प्यारी आवाज़ याद आती है,
सच वो माँ बहुत याद आती है।
👩‍🌾सखी तू तो तेरी माँ से मिल पाती है,
जिसने तुझे बड़ा कर विदा किया,
तुझे वो याद आती है।
मेरी वो माँ इस दुनियाँ में नहीं,
जिसने मुझे अपनाया,
ये घर मेरा घर है समझाया,
मुझे वो माँ बहुत याद आती है,
सखी बता मैं क्या करूँ,
मेरी हमसाथि माँ,
मेरी सासु माँ मुझे बहुत याद आती है।

🌼समर्पित उन माँओं को जो अपनी ममता,
कभी नहीं खोती, सींचती है आंगन प्यार से,
और बहुओं को विरासत में देती है लाड़ का बीज।🌼

चारुलता

Saturday, 7 July 2018

मेरी बेटी तू ही बता

मेरी बेटी,
अब तू ही बता दे, की ये क्या है,
तू मेरी चाहत है या,
मैं तेरी मर्ज़ी,
तू मुझे खुशी देती है,
या मैं तुझे सुकून।
अब तू ही बता दे, की ये क्या है,
मैंने तुझे जना है, या तूने मुझे बनाया है,
सीख रही हूं मैं, या समझ रही है तू,
तू ही बात, ना रक्खी कोई शर्त,
ना बाँधा मुझेे,
फिर भी रुकी हूँ तेरी ओर,
कोई शिकायत नहीं,
जो तुझे हो, तो बता,
ख्वाइश है तू मेरी,
सांसे तुझसे से ही चलती है।
ये तेरी मर्ज़ी हो या मेरी,
इस चाहत में खोये रहना चाहती हूँ,
इस प्रकृति का धन्यवाद,
कण-कण का धन्यवाद करना चाहती हूँ,
मैं तुझमे खो जाना चाहती हूँ।।।।

कायशा
चारुलता

Wednesday, 26 April 2017

बचपन दौहराती हूं


तुझमे अपना बचपन दौहराती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
तुझपे जब भी लाड़ लुटाती हूँ,
मेरे माँ-बाऊजी की गोध में खेल आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
जब भी तेरी अठखेलियों पे मुस्कुराती हूँ,
मम्मी-पप्पा को महसूस कर आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
जब गुस्सा करते-करते हँस जाती हूँ,
तब अपने मइके के आँगन में गुडलिया चल आती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।
तेरे हुंकारों में, बड़ों के प्यार को समझ जाती हूँ,
तेरे आने से, मेरा अस्तित्व जान पाती हूँ,
कितनी साधारण है ये ज़िन्दगी,
कितना प्यार है इस जीवन में,
तुझे देख-देख खुद को याद दिलाती हूँ,
तुझमे अपना बचपन दौहरती हूँ,
जो याद नहीं उसे भी जी आती हूँ।।।

चारुलता

Saturday, 25 February 2017

पिंजरा या घर

यहाँ पिंजरे को लोग घर कहा करते है,
दरवाज़े तो दूर, जाली वाली खिड़कियां,
भी तंग खुला करती है,
रसोई की महक तो नहीं,
आस-पास के हाल-चाल को भी,
तांक-झांक समझ लेते हैं,
यहाँ पिंजरे को लोग घर कहते है।
घर के नाम से चेहरे कस लेते है,
छुट्टी के दिन भी बाहर मस्त रहते है,
मेहमान ना आए डर-डर के रहते है,
माँ-बापू को गाँव में अकेला रहने देते है,
यहाँ पिजरे को लोग घर का नाम देते है।
बच्चों को खेलने जाने नहीं देते है,
मेल-जोल से दूर मॉल में खिला लेते है,
बांटके नहीं भीड़ में अकेले,
Ice-cream चखा देते है।
यहाँ पिंजरे मे लोग,
बड़े शेहेर में रहते है,
ऐसा कहते है।।।।।

चारुलता

Tuesday, 14 February 2017

आज के चुटुकुले

 हांजी हस्ती हूँ मैं भी,
हँसी तो आ ही जाती है,
जो चुटुकुलों का स्तर गिरा है,
शायद उसी पे आती है,
कितना आसान है,
एक माँ की ममता की हँसी उड़ान,
एक बीवी के विश्वास की खिल्ली उड़ान,
एक बहु के समर्पण का मज़ाक उड़ान,
चुटुकुलों की आग से कुछ तो जल रहा है,
संस्कार धुआं बनकर उड़ रहा है,
बनते थे चुटुकुले हँसाने के लिए,
नहीं बनते थे किसी को चुभाने के लिए,
मज़ाक में हाथी की शादी चींटी से होती थी,
लेकिन अब औरत की तुलना चुड़ैल से होती है,
जो सावित्री यम से अपने सुहाग ले आती है,
आज उसका रूप बदल,
करवाचौथ पे अपने,
 पति से पैर धुलवाती है,
 आदमी के सुख की कामना,
 तो आज भी वही औरत करती है,
"गर दुनियां में आज सावित्री नहीं होती है,
तो कौनसा सत्यवान भी जनम लेता है,
 ऊपर वाला जोड़ी बनाकर भेजता है,
 चुड़ैल के साथ तो प्रेत ही होता है",
अगर डरती है थोड़ा,
तो क्या ग़लत करती है,
दुनियां की मायने बदल रही है,
लेकिन स्त्री के अस्तित्व का मज़ाक बनाना,
 चुटकुला है समझकर हँसी तो आती है,
 लेकिन इसमें कोई अच्छाई नज़र नहीं आती है,
 फिर भी स्त्री की शक्ति का अंदाज़ा हो जाता है,
जब औरतें महफिलों में,
इन चुटुकुलों पर हँस देती है,
और जो खुद व्यंग है,
उन्हें भी बक्श देती है।।।।
चारुलता

Tuesday, 7 February 2017

Beti wo hi hai

Kyu ek beti ko har baar batana padhta hai,
Naa Maa tera beta tera hi hai,
Tu hi to chahti hai ki mein uska,
acche se khayal rakkhun,
Jo uske dil mai gajah kr gai to kya hai,
Kyun ek beti ko har baar samjhana padhta hai,
Naa ji mein sabko apna manti hun,
Tu hi chahti hai ki sab khush rahe,
Jo mera samarpan kissi ko bhaya to kya,
Kyun ek beti ko har baar jatana padhte hai,
Naa Maa ab ye mera bhi ghar hai,
Tu hi chahti hai ki ye phale- phoole,
Jo mujhe sarwasreshtha lagta hai,
Maine kiya,
Jaise tune apnaya, waise maine sameta,
Jaise sab tera hua, waise mein bhi sabki bani,
Kyu har beti ko har baar... Baar baar ,
Batana padhta hai Maa tu bhi beti hai,
Waise hi mein beti hun,
Tu Aaj maa hai mein ban rahi hun,
Kyu Maa aapne hi kal ko swikaar nahi pati,
Kyu Maa apne bhavishaya se mukalbla krti hai,
Kyu Maa bhool jaati hai,
Beti aaj bhi hai aur kal bhi
Beti wo hi hai bas kal wo thi aaj ye hai.......
CharuLata